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सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र की भावपूर्ण महागाथा

सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र की भावपूर्ण महागाथा

1.0 प्रस्तावना: सत्य का सूर्य

त्रेतायुग की उस गौरवशाली वेला में, जब अयोध्या का वैभव अपनी पराकाष्ठा पर था, सूर्यवंश के महान राजा हरिश्चंद्र धर्म और न्याय के जीवंत प्रतिमान के रूप में शासन करते थे। वे राजा त्रिशंकु के पुत्र थे और उनकी कीर्ति तीनों लोकों में ‘सत्यवादी’ के रूप में व्याप्त थी। उनका शासनकाल एक ऐसा रामराज्य था जहाँ प्रजा अकाल, रोग, अधर्म या असामयिक मृत्यु के भय से पूर्णतः मुक्त थी। धन, वीर्य और तप से सम्पन्न होते हुए भी कोई नागरिक अभिमान से ग्रस्त नहीं होता था और समाज मर्यादा के सूत्रों में बंधा था। यह कथा उस सत्य की परीक्षा की नींव रखती है जो मानवीय सहनशक्ति, त्याग और वचनबद्धता की समस्त सीमाओं को पार कर जाएगी और धर्म के इतिहास में एक अमिट अध्याय लिख देगी।

इस परीक्षा का सूत्रपात किसी देवसभा में नहीं, वरन एक गहन वन में हुआ। एक दिन जब राजा हरिश्चंद्र आखेट हेतु निकले थे, तो उन्होंने कुछ स्त्रियों का करुण क्रंदन सुना जो ‘त्राहि माम्, त्राहि माम्’ (हमारी रक्षा करो) पुकार रही थीं। एक क्षत्रिय का धर्म निभाते हुए राजा शब्दभेदी बाण की भाँति उस ध्वनि की दिशा में चल पड़े। उन्हें ज्ञात नहीं था कि यह कोई साधारण विलाप नहीं, अपितु महर्षि विश्वामित्र द्वारा अपनी कठोर तपस्या से सिद्ध की जा रही ‘विद्याओं’ का आर्तनाद था जो ऋषि के तेज को सहन नहीं कर पा रही थीं। इस तपस्या में बाधा डालने हेतु विघ्नराज ने राजा के शरीर में प्रवेश कर उनके विवेक को हर लिया।

जब राजा विश्वामित्र के समक्ष पहुँचे, तो उनके मुख से अपने धर्म की रक्षा के स्थान पर अहंकार के शब्द फूट पड़े, जिसने ऋषि की वर्षों की तपस्या को भंग कर दिया। विश्वामित्र का क्रोध प्रलय की अग्नि के समान धधक उठा। जब राजा हरिश्चंद्र चेतना में लौटे और उन्हें अपनी भूल का ज्ञान हुआ, तो वे महर्षि के चरणों में गिरकर क्षमा याचना करने लगे। उनका हृदय आत्मग्लानि से भर गया और उन्होंने ऋषि के कोप को शांत करने हेतु कोई भी प्रायश्चित करने का वचन दे दिया। यहीं से उस महापरीक्षा का आरंभ हुआ जो एक स्वप्न से भी अधिक कठोर और वास्तविक सिद्ध होने वाली थी।

2.0 प्रायश्चित का महादान

यह उस महायज्ञ का आरंभ था जहाँ आहुति केवल संपत्ति की नहीं, वरन देह, मन और आत्मा के कण-कण की दी जानी थी। यह अध्याय उस संकल्प की गाथा है जो एक क्षत्रिय के वचन के भार को परिभाषित करता है—एक ऐसा वचन जो चाहे जागृत अवस्था में दिया गया हो या प्रायश्चित के क्षण में, वह उसके लिए प्राणों से भी अधिक मूल्यवान था। यही वह सिद्धांत है जो मनुष्य को साधारण राजा की श्रेणी से उठाकर ‘सत्यव्रती’ के देव-पद पर स्थापित करता है।

महर्षि विश्वामित्र ने क्रोध में भरकर राजा के प्रायश्चित के वचन को परखने का निश्चय किया। उन्होंने कहा, राजन! यदि तुम वास्तव में अपने किए पर लज्जित हो, तो मुझे वह सब कुछ दान में दो जो तुम्हारे अधिकार में है, केवल अपने शरीर, अपनी पत्नी और अपने पुत्र को छोड़कर।” राजा हरिश्चंद्र ने एक क्षण का भी विलम्ब नहीं किया। उन्होंने अपने वचन को धर्म का आदेश माना और बिना किसी झिझक के अपना संपूर्ण राज्य—अपना कोष, अपनी सेना, अपने हाथी-घोड़े, और अपना समस्त अधिकार—विश्वामित्र के चरणों में अर्पित कर दिया।

वह क्षण अत्यंत मार्मिक और अलौकिक था जब अयोध्या के चक्रवर्ती सम्राट हरिश्चंद्र, उनकी धर्मपरायण पत्नी रानी शैव्या (तारामती) और उनके तेजस्वी पुत्र रोहिताश्व ने राजसी वस्त्रों का त्याग कर साधारण वल्कल वस्त्र धारण कर लिए। उनके चेहरों पर राज्य खोने का विषाद नहीं, बल्कि अपने धर्म और वचन का पालन करने की एक अपूर्व शांति और संतोष का भाव था। उनका यह मौन त्याग उद्घोषणा कर रहा था कि भौतिक सत्ता नश्वर है, किंतु सत्य का संकल्प शाश्वत है।

किंतु राज्य का दान तो केवल उस महायज्ञ की प्रथम आहुति थी; सबसे कठिन परीक्षा अभी शेष थी।

3.0 दक्षिणा की कठोर मांग और काशी की ओर प्रस्थान

यह अध्याय केवल भौतिक संपत्ति के त्याग से आगे बढ़कर, राजा के शारीरिक और मानसिक धैर्य की उस पराकाष्ठा को दर्शाता है, जहाँ वे एक चक्रवर्ती सम्राट से एक साधारण, ऋणग्रस्त व्यक्ति बन जाते हैं। यह उस पवित्र ‘ऋण’ की अवधारणा को रेखांकित करता है, जहाँ एक ब्राह्मण को दिया वचन किसी भी सांसारिक कर्तव्य से ऊपर हो जाता है, और उसे चुकाने का मार्ग काँटों की सेज से भी अधिक पीड़ादायी हो सकता है।

जैसे ही राजा हरिश्चंद्र अपने परिवार के साथ राज्य की सीमा से बाहर जाने को उद्यत हुए, विश्वामित्र ने उन्हें रोक लिया और कहा, “राजन! कोई भी दान बिना दक्षिणा के पूर्ण नहीं होता। तुमने राजसूय यज्ञ के तुल्य यह दान दिया है, अतः अब तुम्हें इसकी दक्षिणा में एक सहस्त्र (1000) स्वर्ण मुद्राएँ देनी होंगी।” उन्होंने यह शर्त भी रखी कि यह दक्षिणा उस राज्य के कोष से नहीं दी जा सकती जो अब उनका हो चुका था। राजा, जो कुछ क्षण पहले तक समस्त ऐश्वर्य के स्वामी थे, अब पूर्णतः कंगाल और एक भारी ऋण के बोझ तले दब गए थे।

अपने वचन की रक्षा के लिए राजा ने विश्वामित्र से दक्षिणा चुकाने हेतु एक माह का समय मांगा, जिसे ऋषि ने स्वीकार कर लिया। इसके बाद राजा हरिश्चंद्र, अपनी पत्नी तारामती और नन्हे पुत्र रोहिताश्व के साथ काशी की पवित्र नगरी की ओर पैदल ही निकल पड़े। जब अयोध्या की प्रजा अपने प्रिय राजा को इस दुर्दशा में देखकर विलाप करती हुई उनके पीछे चल पड़ी, तो विश्वामित्र ने उन्हें बलपूर्वक रोक दिया। ऋषि की निष्ठुरता यहीं नहीं रुकी; राजपरिवार को शीघ्रता से राज्य से बाहर धकेलने के लिए उन्होंने रानी तारामती की पीठ पर छड़ी से प्रहार भी किया। कांटों और पत्थरों से भरे मार्ग पर राजपरिवार के कोमल चरण लहूलुहान हो रहे थे। धूल-धूसरित राजसी मुख, रानी के मौन अश्रु और बालक रोहिताश्व की व्याकुलता को देखकर ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो सत्य की नौका दुखों के महासागर में हिचकोले खा रही थी, किंतु उस नौका का नाविक अपने संकल्प पर वज्र की भाँति अडिग था।

उनकी यह यात्रा उस अंतिम पड़ाव की ओर थी, जहाँ मानवीय रिश्तों, सम्मान और स्वयं के अस्तित्व तक की नीलामी होने वाली थी।

4.0 काशी का हाट: रिश्तों की नीलामी

यह कथा का वह सबसे कारुणिक और हृदय-विदारक अध्याय है जहाँ धर्म और वचन के पालन के लिए एक व्यक्ति अपनी आत्मा के सबसे प्रिय हिस्सों—अपनी पत्नी और अपने पुत्र—का भी बलिदान कर देता है। यह मानवीय त्याग की वह चरम सीमा है जिसकी कल्पना भी मन को कंपा देती है।

काशी पहुँचते-पहुँचते महीने की अवधि समाप्त होने को थी और विश्वामित्र अपनी दक्षिणा वसूलने के लिए वहाँ पहले से ही उपस्थित थे। कोई काम न मिलने के कारण राजा धन जुटाने में असमर्थ थे। अपनी विवशता और पति के धर्म को संकट में देखकर रानी तारामती ने एक ऐसा प्रस्ताव रखा जिसने हरिश्चंद्र के हृदय को विदीर्ण कर दिया। उन्होंने आग्रह किया कि राजा उनके पति-धर्म से पहले अपने सत्य-धर्म की रक्षा करें और उन्हें बेचकर ऋषि का ऋण चुका दें।

अत्यंत भारी मन से, आँसुओं को पीकर राजा हरिश्चंद्र काशी के बाजार में अपनी पत्नी को बेचने के लिए खड़े हो गए। यह एक ऐसा दृश्य था जिसे देखकर पाषाण भी पिघल जाए। अंततः, एक वृद्ध ब्राह्मण ने रानी तारामती को एक दासी के रूप में खरीद लिया। जब वह ब्राह्मण रानी को अपने साथ ले जाने लगा, तो बालक रोहिताश्व अपनी माँ का आँचल पकड़कर रोने लगा और उनसे अलग होने को तैयार नहीं हुआ। उस बालक के करुण क्रंदन को देखकर रानी ने ब्राह्मण से अनुनय किया कि वह उनके पुत्र को भी खरीद ले। कुछ और धन लेकर ब्राह्मण उस बालक को भी उसकी माँ के साथ ले गया।

पत्नी और पुत्र को बेचने से प्राप्त हुई धनराशि भी विश्वामित्र की दक्षिणा के लिए अपर्याप्त थी। तब राजा हरिश्चंद्र ने अपने वचन की पूर्णता के लिए स्वयं को बेचने का अंतिम निर्णय लिया। उस समय उन्हें खरीदने के लिए कालिया नामक एक चांडाल आगे आया, जो श्मशान घाट का स्वामी था। एक सूर्यवंशी क्षत्रिय के लिए चांडाल का दास बनना मृत्यु से भी बढ़कर था, किंतु धर्म के समक्ष उन्होंने अपने कुल के अभिमान को भी त्याग दिया। उन्होंने स्वयं को उस चांडाल के हाथों बेच दिया। पौराणिक आख्यानों के अनुसार, वह चांडाल कोई और नहीं, बल्कि स्वयं भेष बदले हुए धर्मराज थे जो राजा की परीक्षा अपने अंतिम चरण में ले जाने आए थे।

इस प्रकार, अयोध्या का सम्राट अब काशी के श्मशान घाट का एक दास बन चुका था, जहाँ उसका पतन अपनी निम्नतम अवस्था में पहुँच गया था।

5.0 श्मशान की सेवा और नियति का क्रूर प्रहार

यह अध्याय उस द्वंद्व को उजागर करता है जहाँ एक चक्रवर्ती सम्राट की नियति उसे श्मशान घाट पर मुर्दों से कर वसूलने वाले दास के रूप में ले आती है। और इसी भयावह पृष्ठभूमि में उसके जीवन की सबसे दारुण त्रासदी घटित होती है, जो उसके धैर्य और धर्म की अंतिम सीमाओं को भी चुनौती देती है।

चांडाल के दास के रूप में, राजा हरिश्चंद्र का जीवन श्मशान घाट पर व्यतीत होने लगा। उनका कर्तव्य था कि वे दाह संस्कार के लिए आने वाले प्रत्येक शव से कर वसूलें और अपने स्वामी के प्रति पूर्ण निष्ठा का पालन करें। उन्होंने अपने अतीत, अपने राजसी वैभव और अपने परिवार की स्मृतियों को मन के किसी कोने में दबाकर स्वयं को इस कठोर कर्म में डुबो दिया। दिन-रात चिताओं की धधकती आग और मृतकों के परिजनों के विलाप के बीच वे अपने स्वामी-धर्म का पालन करते रहे, मानो वे स्वयं एक जीवित शव हों।

उधर, रानी तारामती उस वृद्ध ब्राह्मण के घर दासी का जीवन व्यतीत कर रही थीं। नियति का क्रूरतम प्रहार तब हुआ जब उनके एकमात्र पुत्र रोहिताश्व को बगीचे में पुष्प चुनते हुए एक विषैले सर्प ने डस लिया और उसकी तत्काल मृत्यु हो गई। उस माँ के असहनीय दुःख और करुण विलाप को सुनने वाला वहाँ कोई नहीं था। बेबस, अकेली और निर्धन रानी के पास अपने पुत्र के कफ़न तक के लिए पैसे नहीं थे। वह अपने मृत पुत्र के शव को गोद में उठाकर, रोती-बिलखती उसी श्मशान घाट की ओर चल पड़ी, जहाँ उसका पति अनजाने में उसकी प्रतीक्षा कर रहा था।

इस प्रकार, नियति ने एक ऐसी भयावह रात्रि का मंचन किया, जहाँ एक माँ अपने मृत पुत्र के दाह संस्कार के लिए उस पिता के समक्ष पहुँचेगी जो अपने कर्तव्य से बंधा हुआ, उससे भी कर मांगने को विवश होगा। यह धर्म की अंतिम और सबसे कठिन अग्नि-परीक्षा थी।

6.0 धर्म की अग्नि-परीक्षा: कर्तव्य और मोह का चरम द्वंद्व

यह कथा का वह चरमोत्कर्ष है, वह निर्णायक क्षण, जिसे ‘धर्म-संकट’ कहते हैं। यहीं राजा हरिश्चंद्र की महानता सिद्ध होती है—राज्य दान करने में नहीं, पुत्र के शव के सामने भी अपने स्वामी-धर्म से तिल भर भी विचलित न होने में। यहाँ दो धर्म—एक पिता का धर्म (पितृ-धर्म) और एक दास का धर्म (स्वामी-धर्म)—आमने-सामने खड़े थे, और हरिश्चंद्र ने उस धर्म को चुना जो उनके वर्तमान वचन से बंधा था।

अंधेरी रात थी, आकाश में बिजलियाँ कौंध रही थीं और मूसलाधार वर्षा हो रही थी। इसी प्रलयंकारी वातावरण में रानी तारामती अपने मृत पुत्र रोहिताश्व के शव को गोद में लिए श्मशान घाट पहुँचीं। दुःख, परिश्रम और अभाव ने दोनों के स्वरूप को इतना बदल दिया था कि हरिश्चंद्र अपनी पत्नी और पुत्र को तुरंत पहचान नहीं पाए। उन्होंने एक साधारण स्त्री समझकर उसे रोका और दाह संस्कार के लिए निर्धारित कर (tax) की मांग की।

जब बिलखती हुई रानी ने अपना परिचय दिया और बताया कि यह मृत बालक अयोध्या का राजकुमार रोहिताश्व है, तब हरिश्चंद्र पर मानो वज्रपात हो गया। उनके पैरों तले धरती खिसक गई। सामने उनके इकलौते पुत्र का निष्प्राण शरीर था और पास में उनकी पत्नी असहाय खड़ी रो रही थी। एक पिता का हृदय असहनीय दुःख से फट रहा था, किंतु दूसरे ही पल उन्हें अपने दास-धर्म का स्मरण हो आया। अपने व्यक्तिगत मोह और पीड़ा को कर्तव्य की वेदी पर होम करते हुए उन्होंने लौह-संकल्प से अपनी पत्नी से कहा:

                                            “देवी! मैं चांडाल का दास हूँ। बिना कर लिए मैं अपने स्वामी की आज्ञा के 

                                                  विरुद्ध अपने पुत्र का भी अंतिम संस्कार नहीं करने दे सकता।”

यह संवाद उनके फौलादी चरित्र का प्रमाण था। रानी तारामती के पास कर चुकाने के लिए एक कौड़ी भी नहीं थी। अपने पति के धर्म की रक्षा के लिए उन्होंने अपनी पहनी हुई साड़ी का आधा आँचल फाड़कर कर के रूप में देने का प्रयास किया। यह त्याग की वह पराकाष्ठा थी जिसे देखकर स्वयं सृष्टि भी स्तब्ध रह गई।

जैसे ही सत्य और कर्तव्य का यह अभूतपूर्व दृश्य अपनी चरम सीमा पर पहुँचा, ब्रह्मांड ने उस अद्भुत क्षण को देखने के लिए हस्तक्षेप किया।

7.0 ईश्वरीय हस्तक्षेप और सत्य की अमर विजय

यह अंतिम अध्याय केवल एक सुखद अंत नहीं है, बल्कि यह उस सार्वभौमिक सिद्धांत की पुष्टि है कि सत्य और धर्म के मार्ग पर चलने वालों की अंततः विजय होती है, चाहे उनकी परीक्षा कितनी भी कठोर क्यों न हो। यह उस विश्वास की विजय है कि सत्य परेशान हो सकता है, पराजित नहीं।

जैसे ही रानी तारामती ने अपनी साड़ी का पल्लू फाड़ा, आकाश में दिव्य प्रकाश कौंध उठा। उसी क्षण स्वयं महर्षि विश्वामित्र, अपने चांडाल रूप को त्यागकर वास्तविक स्वरूप में धर्मराज, और उनके साथ देवराज इंद्र, साध्यगण, विश्वेदेव, मरुद्गण एवं अन्य सभी देवता वहाँ प्रकट हो गए। विश्वामित्र ने आगे बढ़कर कहा, “राजन हरिश्चंद्र, तुम धन्य हो! तुम्हारी सत्यनिष्ठा और धर्मपरायणता अतुलनीय है। यह सब तुम्हारी परीक्षा लेने के लिए रचा गया एक स्वांग था, और तुम इस सबसे कठिन परीक्षा में स्वर्ण की भाँति खरे उतरे हो।”

देवराज इंद्र ने अमृत वर्षा करके बालक रोहिताश्व को पुनर्जीवित कर दिया। बिछड़ा हुआ परिवार एक बार फिर से मिल गया। महर्षि विश्वामित्र ने राजा हरिश्चंद्र को उनका संपूर्ण राज्य आदर सहित लौटा दिया और देवताओं ने उन्हें सपरिवार स्वर्ग में स्थान देने का वरदान दिया। किंतु यहाँ भी राजा ने अपनी महानता का परिचय दिया। उन्होंने अकेले स्वर्ग जाने से यह कहकर इनकार कर दिया कि उनकी प्रजा उनके सुख-दुःख की समान भागीदार है। उन्होंने कहा, “जिस प्रजा ने मेरे वियोग में आँसू बहाए हैं, उन्हें छोड़कर मैं अकेले स्वर्ग का सुख कैसे भोग सकता हूँ?” राजा के इस निस्वार्थ आग्रह से प्रसन्न होकर देवताओं ने उनकी समस्त प्रजा को भी स्वर्ग में स्थान प्रदान किया।

राजा हरिश्चंद्र की यह कथा आज भी ईमानदारी, वचनबद्धता और धर्म-निष्ठा के लिए सर्वोच्च प्रेरणा का स्रोत है। यह हमें त्याग का वेदांतिक महत्व सिखाती है और यह सिद्ध करती है कि भौतिक संपत्ति नश्वर है, किंतु सत्य का आदर्श अमर है। उनकी कीर्ति आज भी भारतीय जनमानस में इस दोहे के रूप में जीवित है:

चन्द्र टरै सूरज टरै, टरै जगत व्यवहार।

पै दृढ़ श्री हरिश्चंद्र को, टरै न सत्य विचार॥”

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